17 को संक्रांति महोत्सव और 18 अगस्त को भगवान नेमिनाथ का दीक्षा कल्याणक महोत्सव होगा
बीकानेर। तपागच्छीय गच्छाधिपति पद्मश्री आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंदसूरिश्वरजी महाराज साहेब की आज्ञानुवर्तिनी साध्वी प्रीतिरत्ना, साध्वी प्रीतिसुधा एवं साध्वी प्रीतियशा महाराजसा आदि ठाणा-3 के पावन सान्निध्य में रांगड़ी चौक स्थित पौषधशाला में चल रहे त्रिदिवसीय धार्मिक आयोजनों के तहत रविवार को लूखी नेवी एकासना की तप आराधना हुई। आत्मानंद जैन सभा चातुर्मासिक समिति के सुरेंद्र बद्धाणी ने बताया कि आयंबिलशाला में हुई इस आराधना में 60 श्राविकाओं ने पंजीयन करवाया था।
सोमवार को संक्रांति महोत्सव के आयोजन होंगे, जिनमें जिन पूजा, आराधना, सामायिक, प्रतिक्रमण, तप, स्वाध्याय एवं धार्मिक प्रवचन होंगे। 18 अगस्त को भगवान नेमिनाथ का दीक्षा कल्याणक महोत्सव मनाया जाएगा। इस अवसर पर चातुर्मास स्थल को भव्य रूप से सजाया जाएगा। लुधियाना से शिखा जैन द्वारा संगीतमय स्नात्र पूजा करवाई जाएगी। स्नात्र पूजा में 11 परिवार इंद्र-इंद्राणी के रूप में शामिल होंगे। इनमें मानकचंद-शांतिलाल सेठिया परिवार, पुष्पादेवी-सुरेंद्र कुमार बद्धाणी परिवार, भंवरलाल-शांतिलाल कोचर परिवार, ऋखबदास-शांतिलाल भंसाली परिवार, हनुमानदास-पन्नालाल सिपानी परिवार, फतेहचंद-प्रदीप कुमार कोचर परिवार, कल्याण मित्र मंडल के ऋखबदास-जितेंद्र परिवार, केसरीचंद-राजेंद्र-राहुल परिवार, कविता जैन परिवार एवं महिला मित्र मंडल सहित अन्य लाभार्थी शामिल हैं। भगवान नेमिनाथ के दीक्षा कल्याणक में निहित सूत्रों एवं कथनों के अनुरूप साध्वीवृंद द्वारा प्रवचन भी होगा।
समिति के शांतिलाल हनु कोचर ने बताया कि सोमवार के क्रमिक आयंबिल का लाभ प्रियंका जैन ने लिया। प्रमिला देवी कोचर की तेला तपस्या जारी है। श्रीसंघ पूजा का लाभ त्रिलोकचंद, महेंद्र कुमार एवं कुलदीप कोचर परिवार ने लिया। 14 पूर्व तपस्या के लाभार्थियों में ऋखबदास, जितेंद्र एवं विकास सिरोही परिवार, केसरीचंद एवं राजेंद्र प्रसाद कोचर परिवार तथा मेघराज, संपतलाल एवं कांतिचंद कोचर परिवार शामिल रहे।
दान, शील, तप और भाव धर्म की आराधना के चार आधार : प्रीतिसुधा महाराजसा
प्रीतिसुधा महाराजसा ने प्रवचन में कहा कि धर्म के चार प्रमुख प्रकार दान, शील, तप और भाव हैं। इनका उद्देश्य जीव के भीतर रहने वाली आहार, भय, मैथुन और परिग्रह की संज्ञाओं को कमजोर करना है। दान से परिग्रह की भावना कम होती है, तप से आहार संज्ञा पर नियंत्रण आता है और शील के माध्यम से भय एवं अन्य आसक्तियों से ऊपर उठने की साधना होती है। उन्होंने कहा कि परिग्रह केवल वस्तुओं का संग्रह नहीं, बल्कि उनके प्रति ममत्व और मोह का भाव रखना भी परिग्रह है।कुमारपाल और सोना एकत्र करने वाले चूहे के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मोह का प्रभाव अगले भव तक साथ चलता है। इसलिए व्यक्ति को अपने पापों की आलोचना-प्रतिक्रमण के माध्यम से शुद्धि का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिनशासन में परमात्मा की आज्ञा का पालन ही मोक्ष का मार्ग है और साधु जीवन में गुरु की आज्ञा का पालन सबसे बड़ा धर्म माना गया है। साधु को गुरु की आज्ञा के बिना कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
महाराजसा ने कहा कि आत्मकल्याण के लिए संसार, स्वजन और शरीर - इन तीनों के मोह का त्याग करना आवश्यक है। परमात्मा के वचनों में श्रद्धा रखकर जीवन में उनकी आज्ञा का पालन करना ही धर्म की वास्तविक साधना है।
इस अवसर पर स्नात्र महोत्सव का भी आयोजन किया जाएगा। शास्त्रों में वर्णित परंपरा के अनुसार भगवान के अभिषेक का आयोजन इंद्र-इंद्राणी के रूप में किया जाएगा। श्रीमती शिखा मधुर स्वर में स्नात्र पूजा कराएंगी। शास्त्रों के अनुसार 64 इंद्रों द्वारा भगवान का अभिषेक किए जाने की परंपरा का स्मरण करते हुए श्रद्धालु धार्मिक विधि से स्नात्र महोत्सव में भाग लेंगे।

